उज्जैन में विष्णु सागर का जीर्णोद्धार

क्षिप्रा नदी के किनारे बसी पौराणिक उज्जैन नगरी अपने तीर्थो, ज्योतिर्लिंग और बारह वर्षो में होने वाले कुम्भ मेले के लिए हिन्दू धर्म में एक विशिष्ट महत्व रखती है। ग्रीनविच रेखा के मानक समय की वर्तमान व्यवस्था से पहले भारतीय समय इसी नगरी के बीच से गुजरती कर्क रेखा से तय किया जाता था। आज सदियों बाद भी, शिशु के जन्म के समय लिखी जाने वाली जातक, लग्न व राशिफलों के लिए उज्जैन से गुजरती यह रेखा ही समय का मानक है। अपने पौराणिक महत्व के साथ साथ मध्यकालीन भारत में उज्जैन, अवन्ति साम्राज्य की राजधानी रही जो वर्षो तक मध्यभारत की राजनैतिक, व्यवसायिक व सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित हुई जब तक की ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा राजधानी को इंदौर स्थानांतरित किया गया।

माननीय प्रधानमंत्री की अगुवाई वाली केंद्रीय कमेटी ने देश के 100 शहरों में उज्जैन को भी स्मार्ट सिटी के तौर पर विकसित करने के लिए चुना, जिसके लिए जिला प्रशासन निरंतर कार्यरत है। इसमें कोई दोराहा नहीं है की उज्जैन में स्थित ऐतिहासिक जलाशयों को भी धार्मिक व पर्यटन की दृष्टि से स्मार्ट सिटी योजना के अंतर्गत विकसित किया जाएगा। इन जलाशयों में सात तालाबों का एक समूह जिसे सप्तसागर के नाम से भी जाना जाता है, जिनके नाम – रूद्र सागर, पुष्कर सागर, क्षीर सागर, गोवर्धन सागर, रत्नाकर सागर, विष्णु सागर व पुरुषोत्तम सागर है। प्रत्येक तालाब की अपनी विशिष्ट महत्वता व पूजन करने का अलग विधान रखता है, हर 12 वर्षो में होने वाले कुम्भ मेले के लिए प्रशासन द्वारा इन सभी तालाबों की सफाई व रखरखाव की विशेष तैयारियां की जाती है।

हालाँकि वर्तमान परिदृश्य में ये अनमोल धरोहर नजरअंदाजी का शिकार है, बढ़ती जनसँख्या के चलते आवास की मांग, औद्योगिकीकरण एवं असंख्य भौतिक सुविधाओं से परिपूर्ण आम दिनचर्या इन तालाबों के लिए प्रतिकूल साबित हो रही है, जिसमे अतिक्रमण, कचरा व सीवेज निस्तारण मुख्या समस्याए है। आज ये जलाशय आसपास के रहवासियों तथा व्यवसायिक प्रतिष्ठानों द्वारा डाले गए कचरे, हवा के साथ उड़कर आने वाले पॉलिथीन से अटे हुए है। यहां तक की घरेलू उपयोग के बाद निष्काषित सीवेज भी इन जलाशयों तक पहुंच रहा है। बेतरीब ढंग से उगी हुई हानिकारक खरपतवार तथा सीवेज, बारिश के साथ आये अवसाद आज गाद का रूप ले चुके है। हर घर में पहुंची नल की व्यवस्था, बढ़ती बोरवेल की संख्या के कारण आज इन तालाबों की उपयोगिता सिर्फ धार्मिक अनुष्ठानो तक सिमट कर रह गयी है। पूजा सामग्री तथा श्रद्धालुओं द्वारा छोड़ी गयी अन्य वस्तुए भी अंततः इन तालाबों में जाकर गंदगी फैलाती है।

इसी क्रम में उज्जैन म्युनिस्पल कॉर्पोरेशन के साथ मिलकर एन्वायर्नमेंटलिस्ट फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया ने यहाँ अपने पहले प्रोजेक्ट विष्णु सागर पर काम करना शुरू किया है। इस बहुआयामी प्रोजेक्ट के अंतर्गत विष्णु सागर स्थित द्वितीयक तालाब से खरपतवार की कटाई, गाद की खुदाई तथा तालाब के चारो ओर तटबंध का निर्माण किया जाएगा। विदेशी बबूल जैसी तेजी से फैलने वाली खरपतवार न सिर्फ गहराई से जल सोखकर मिट्टी की नमी को काम करती है बल्कि अन्य लाभकारी पौधों को बढ़ने नहीं देती है। वर्षो से जमती आ रही गाद से तालाब की पानी भंडार करने की क्षमता में कमी तो आती ही है साथ ही यह पानी को भूजल में मिलने में विलम्ब उत्पन्न करती है जिससे वाष्पीकरण से होने वाली जल हानि भी बढ़ जाती है।

गाद खुदाई से निकली मिट्टी से ही तटबंधों का निर्माण, स्वतंत्र टापुओं का निर्माण किया जाएगा जो क्रमशः तालाब की सुरक्षा की पहली दीवार के रूप में और पक्षियों व जलीय जीवो के लिए एक सुरक्षित प्राकृतिक आवास प्रदान करेगा। साथ ही साथ इनलेट व आउटलेट चैनल्स की सफाई व व्यवस्थित जल बहाव सुनिश्चित किया जाएगा। तालाब पुनरुद्धार के अंतिम चरण में तालाब के तटबंध पर वृक्षारोपण किया जायेगा जिससे न सिर्फ तटबंध को मृदा अपरदन से सुरक्षा मिलेगी साथ ही इस ग्रीन बेल्ट का विकास स्थानीय पशु, पक्षिओ व सरीसृपों व स्तानीय जैव विविधता के लिए लाभदायी सिद्ध होगा।

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