हलियाकी तालाब का जीर्णोद्धार

हेली मंडी को पहलावास कस्बे से जोड़ने वाली सड़क पर स्थित है हालियाकी नामक गांव । इसी गांव में EFI द्वारा जौहर बाबा मंदिर पर तालाब का जीर्णोद्धार कार्य दिसंबर 2023 में शुरू किया गया । लगभग २ एकड़ के इस तालाब के चारो तरफ खरपतवार मुख्यतः विदेशी बबूल ने कब्ज़ा जमाया हुआ था, यह प्रजाति देशी प्रजाति के पौधों के बढ़ने में व्यवधान उत्पन्न करती है साथ ही भूजल का अत्यधिक दोहन करती है । इसके अलावा तालाब में वर्षो से जमा गाद जो की वर्षा जल के साथ बह कर तालाब के तल में लगभग ३-४ फ़ीट की मोटी परत के रूप में जमा हो गयी थी। इस गाद से न सिर्फ पानी की गुणवत्ता कम होती है, साथ ही भूजल रिचार्ज भी रुक जाता है क्योकि यह परत पानी को आसानी से अंदर जाने से रोकती है।

अतः EFI द्वारा सर्वप्रथम विदेशी खरपतवार का जड़ सहित उन्मूलन किया गया और उसे ग्रामीणों ने जलावन की लकड़ी के रूप में उपयोग करने के लिए ले जाया गया। तत्पश्चात तले में जमी गाद की परत की खुदाई शुरू की गयी। इसी गाद से तालाब के चारो तरफ के बंधो को दुरुस्त किया गया साथ ही एक अतिरिक्त द्वितीयक बंध का निर्माण भी किया गया । दोहरे बंध से अब तेज वर्षा के समय भी तालाब की क्षमता व सुरक्षा में काफी हद तक वृद्धि होगी।

खोदी गयी गाद का उपयोग बंधो में करने के बावजूद यह गाद काफी मात्रा में उपलब्ध थी क्योकि ३-४ फ़ीट की खुदाई पूरे तालाब के क्षेत्रफल में की गयी थी। अतः इस अतिरिक्त गाद को पंचायत के सहयोग से ट्रेक्टर ट्रॉलियों द्वारा तालाब से साथ में लगती जमीन पर डाल कर सामान रूप से फैलाया गया । चूंकि यह गाद एक प्राकृतिक उर्वरक की तरह कार्य करती है, इस जमीन पर सघन वृक्षारोपण किया जा सकेगा ।

अब गहरीकरण के बाद तालाब में सुरक्षा की दृष्टि से तारबंदी की गयी ताकि किसी प्रकार की दुर्घटना की संभावना को दूर किया जा सके ।
यह तालाब एक सिंचाई नहर से अपना जल प्राप्त करता है जो हरियाणा के यमुना नगर जिले में स्थित हथिनी बैराज से आती है। हथिनी बैराज पश्चिमी यमुना सिंचाई परियोजना का ही एक भाग है जिसकी गिनती विश्व के सबसे बड़े नहरी सिंचाई परियोजनाओं में की जाती है। एक छोटे से हलियाकी नूरगढ़ तालाब की महत्वता इसी कारण से और बढ़ जाती है।

ग्रामीण भी तालाब को पूरी तवज्जो देते है तथा किसी भी प्रकार का कचरा तालाब में नहीं जाने देते है। तालाब से समीप ही लगी बोरिंग से गाँव में जल की आपूर्ति होती है अतः सभी जानते है की भूजल के रिचार्ज , गांव के खेतो की सिंचाई और पशुधन की जल आवश्यकता के लिए इस तालाब की भूमिका अहम है। गांव के ही एक बुजुर्ग से बात करने पर पता चला कि ग्रामीणों के लिए इस तालाब का जल उतना ही पवित्र है जैसे गंगा नदी का जल, साथ ही उन्होंने बताया जी तालाब के तट पर स्थित वट वृक्ष लगभग २०० वर्ष पुराना है।

पुनरुद्धार के बाद तालाब में नहर से आता स्वच्छ जल किसी लैगून झील की भांति नीला- हरा दिखाई पड़ता है तथा गांव वासी काफी खुश है । साथ ही मानसून में जब यहां वृक्षारोपण होगा तो विभिन्न पक्षियों, कीटो तथा तितलियों की प्रजातियों को आवास मिलेगा।
हालियाकी नूरगढ़ का यह तालाब एक बहुआयामी भागीदारी की एक और सफल कहानी है जिसमे प्रशासन, नागरिक तथा गैर लाभकारी संरक्षण संस्थान की मिली जुली भूमिका रही।

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